
कैसे विधियों में ना उलझकर वास्तविक ध्यान में उतरें |
इसका बोध होने के लिए आपको समझना होगा
कि ध्यान के नाम पर आप जो विधियाँ कर रहे हो वो सिर्फ थेरेपी है।
थेरेपी यानि मानसिक इलाज का तरीका।
आपको पता ही नहीं है कि ध्यान क्या है।
ध्यान कोई क्रिया नहीं है, कोई करने की चीज़ नहीं है
लेकिन अभी करोड़ों लोग जो कर रहे वो सिर्फ अध्यात्म के नाम पर छलावा है।
आप अपना समय, धन, ऊर्जा और जीवन बर्बाद कर रहे हो।
ध्यान है मन को छोड़ने की कला।
जब आप किसी बंधे हुए पैटर्न पर नहीं चलते,
निरंतर पुराने संस्कारों, धारणाओं, परम्पराओं, विचारों को छोड़ते जाते हैं, स्वतःस्फूर्त जीते हैं,
सत्य, प्रेम, चेतना और सृजन की दिशा में बढ़ते रहते हैं, तो आप मन के पार की अवस्था में जीने लगते हैं और यही ध्यान की अवस्था है।
थेरेपी, जिसको आप ध्यान विधि बोलते हो,
उसको करते हुए आप उसी भीड़ का हिस्सा बने रहते हो,
वही घिसे-पिटे ढंग से जीते हो, और खुद को आध्यात्मिक भी समझते हो।
ध्यान की अवस्था में प्राकृतिक तरीके से जाने के लिए रोज सुबह सत्संग में शामिल हों |
और साथ ही महाजीवन शिविर में आएँ।
कैसे विधियों में ना उलझकर वास्तविक ध्यान में उतरें
थोड़ा विधियों पर प्रकाश डालते हैं कि विधियां आखिर क्या होती हैं और उनकी ईजाद आखिर क्यों की गई ?
थेरेपी का ईजाद तब किया जाता है , जब बात हाथ से निकल चुकी हो |
इसका अर्थ ये है कि अधिकाँश लोग बुद्धिमान नहीं होते हैं |
और उनकी समझ न के बराबर रही है |
ऐसे लोगों से कोई संवाद सीधा सीधा नहीं किया जा सकता है |
जैसे मानसिक रोगी जो किसी पागलखाने में दाखिल हैं , कभी कभी हिंसक भी हो जाते हैं |
ऐसे में उनसे सीधे सीधे बातचीत नामुमकिन है |
ऐसे लोगों को कभी बलपूर्वक या कभी दवाइयों के सहारे से काबू करना पड़ जाता है |
अतीत में गुरुओं ने भी पागलपन को ठीक करने के लिए विधियों का ही सहारा लिया है |
लेकिन कुछ दुर्लभ बुद्धिमान लोगों के साथ गुरुओं ने संवाद किया है और उन्हें शिष्य बनाया है |
दिलचस्प और हैरान करने वाली बात है कि अधिकांश गुरु जगत में विधि कभी नहीं देते रहे हैं |
मिसाल के तौर पर कबीर, लाओत्से , ज़ेन के गुरु , अष्टावक्र , जनक , जे कृष्णमूर्ति – इन सभी गुरुओं ने कभी कोई विधियां नहीं दी हैं |
विधियों को करना मात्र नासमझी है और किसी जीवित ज्योति के अन्तर्धान हो जाने के पश्चात् उसकी विधि करना जानलेवा है |
ठीक उसी तरह जिस तरह किसी केमिस्ट की बनाई दवाई का २०० साल पुराना फार्मूला आज भी इस्तेमाल करने के लिए बेचैन रहना |
एक जीवित गुरु के आसपास एक आभामंडल है , एक ऊर्जा क्षेत्र है
– जिसमें विधियां जिस गुरु से वो आईं हैं , उसी गुरु के जीते जी वो विधियां काम करती हैं |
गुरु के मरने के बाद उसकी विधियों में कोई सार नहीं रह जाता |
ध्यान में सिर्फ जीवित गुरु के साथ संवाद के साथ जाया जा सकता है |
और इसके लिए यही मानना चाहिए कि हम जो भी जानते हैं , वही सब कुछ नहीं है |
बहुत कुछ और भी हो सकता है |
बहुत कुछ जानना बाकी है |
हमें अपने सर को झुकाकर गुरु पर श्रद्धा यानि अटूट भरोसा करना होगा |
इसका अर्थ होगा कि गुरु की हर बात को ठीक जानते हुए गुरु की अँखियों से देखने की कोशिश करनी होगी |
जब ऐसा होने लगेगा तो हम सहजता से ध्यान में उतरने लगेंगे |
ऐसा करने के लिए रोज़ सवेरे सत्संग में आएं |
सत्संग में हम संवाद करते हैं , इसीलिए अपने जीवन के किसी भी शारीरिक , मानसिक , आर्थिक , भावनात्मक पहलु से जुड़े सवाल भी लेकर आ सकते हैं और पूछ सकते हैं |
आने के लिए + 91-9820115793 पर व्हाट्सप्प करके सम्पर्क कर सकते हैं |

