सच नज़रिया या नियम

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सच नज़रिया या नियम 

क्या सच नज़रिया या नियम है ! क्या सत्य व्यक्तिगत है या सभी पर लागू होने वाला है ! 

 व्यक्तिगत सत्य जैसी कोई बात नहीं होती है , होती ही नहीं है !

मेरे नजरिए से सत्य , तेरे नजरिए से सत्य , 

मेरे अनुभव से सत्य , तेरे अनुभव से सत्य –

 इसका भी कोई मतलब नहीं है और नहीं हो सकता है !

क्योंकि कोई व्यक्ति अगर ऐसी बातें बहुत ज्यादा करता है तो 

वह व्यक्ति  सिर्फ अहंकार और अपनी क्षुद्र अवस्था की घोषणा करता है |

 इसका अर्थ यही है कि वो अपने मन की जकड़ में है 

और उसे सत्य का कुछ पता हो – ऐसी कोई संभावना नहीं है !

तो क्या सच नज़रिया या नियम है

वस्तुतः जिस रूप में हम व्यक्ति होते हैं , 

जब वो रूप नहीं रह जाता , 

जब व्यक्ति ही नहीं रह जाता ,

 पूर्ण रूप से तिरोहित हो जाता है – तो जो बचता है, वही सत्य है |

जब अपना कोई नज़रिया ही ना रह जाए और मेरा नज़रिया, तेरा नज़रिया- बेमानी हो जाए तो जो प्रकट होता है – उसे ही सत्य कहते हैं !

जब सब नज़रिए अपने लगने लगें तो 

जो बचे ,वही सत्य है ! 

सच का वजूद नज़रिए का मोहताज़ नहीं होता , हो ही नहीं सकता !

सत्य नज़रिया नहीं होता है , सत्य अनुभव भी नहीं है ! 

जीवन नज़रिए में नहीं समाता, 

जीवन अनुभवों की अंतहीन श्रंखला है | 

क्या जीवन का सच नज़रिया या नियम है 

और इसीलिए आजतक के अनुभवों से बने हुए किसी भी नज़रिए को अगले ही क्षण धता बता दे 

– ऐसा ही जीवन है ! 

समस्त अनुभवों से जो हमारी दृष्टि बनती है – वो एक पल में बेमानी हो जाती हो , तो वही जीवन है , तो वही सत्य है !

सत्य अनुभवों के पार है , अनुभवातीत है | 

तो क्या किसी की दृष्टि और नज़रिया सत्य का दर्शन ही नहीं कर सकता है !

तो किसी की दृष्टि से दिखने वाला सच नज़रिया या नियम है – आखिर क्या बात है 

 किसी की दृष्टि और नज़रिया सत्य का दर्शन बिल्कुल कर सकता है 

लेकिन ऐसा व्यक्ति अ-मन की अवस्था में होता है

ऐसा व्यक्ति वस्तुतः व्यक्ति है ही नहीं, ऐसा व्यक्ति अनंत है !

 ऐसे व्यक्ति को हम गुरु कहते हैं और उसके नज़रिये, उसकी दृष्टि को हम सत्य के रूप में स्वीकार करते रहे हैं !

उसकी पुराणी पहचानें जा चुकी हैं | 

अब वो किसी ख़ास व्यवहार में नहीं समा सकेगा | 

कोई भी व्यक्ति जो जीवन में गहरे जाए | 

और गहराई में मन तो नहीं ही होता है , गहराई में हम मन के पार होते हैं !

 ऐसे लोग कोई सृजनात्मक चित्रकार, कोई गायक , कोई Walt Whitman , कोई Bertrand Russell, कोई Einstein, कोई जिद्दू कृष्णमूर्ति – ऐसे ही व्यक्ति दृष्टि के स्वामी होते हैं क्योंकि दर्शन करने में पूरी भीड़ कभी सक्षम हो नहीं सकती !

अब आपको कुछ झलक मिली होगी कि सच नज़रिया या नियम दोनों में से क्या है 

कठोर होगा परंतु सत्य है कि प्रत्येक को दृष्टि रखने का कोई अधिकार नहीं है और ना हो सकता है,

तब तक, जब तक वो मन को नहीं छोड़ देता !

हरएक को नज़रिया रखने की काबिलियत का मालिक समझना भूल है !

हरेक को झलक तक न मिली होगी कि सच नज़रिया या नियम दोनों में से क्या है | 

हर व्यक्ति ना दृष्टा है , ना हर व्यक्ति के पास नज़रिया रखने की स्वतंत्रता और अधिकार होना चाहिए !

भविष्य में थोड़ी और बेहतर और ईमानदार दुनिया में ये बिल्कुल नहीं समझा जाएगा कि हर व्यक्ति दृष्टि और नज़रिया रख सकता है !

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फिर ऐसे सवाल खड़े नहीं होंगे कि सच नज़रिया या नियम ! 

केवल एक शिष्य ही दृष्टि रखता है, या दृष्टा होने लगता है 

या नज़रिया होने के काबिल हो जाता है |

एक बेहोश आदमी सत्य को दरकिनार करने के लिए ऐसी बातों का सहारा लेता है कि तेरे नज़रिए से सत्य , मेरे नज़रिए से सत्य ,

तेरे अनुभवों से सत्य – 

सत्य को बेहोश आदमी व्यक्तिगत बना देता है 

और कहीं ना कहीं अपनी बेहोशी को अपना सत्य बताकर वही करना चाहता है जो करता आया है !

 वो बड़ी चालाकी से गुरु को भी ऐसी ही बातें बोलता है 

कि जो आप कह रहे हो , वो आपकी निजी सोच है – आप ठीक हो सकते है ,

 लेकिन मुझपर आपकी बात ठीक नहीं बैठती है !

आपका सम्मान , आप ज्ञानी गुरु , लेकिन आपकी ये सब निजी सोच है – मेरी सोच अलग है ! ये मन की बड़ी से बड़ी धूर्ततापूर्ण हरकतों में से है !

 हम समझ भी नहीं पाते कि मन हमें कहाँ धोखा दिए चला जा रहा है !

तेरी सोच , मेरी सोच – सब बेवकूफी की बात है ! 

मेरी हर सोच सभी की सोच है ! 

सोच निजी नहीं है , जिस्म या शरीर कुछ निजी हो सकते हैं –

 वैसे वो भी निजी नहीं हैं !

 शरीर तक निजी नहीं हैं , तो सोच और नज़रिए कहाँ निजी हो पाएंगे !

निजी सोच भूल है , अहंकार है , अज्ञान का प्रतीक है !

सभी की सोच मेरी सोच है !

सत्य सामुहिक है 

 हो सकता है कि सामुहिक रेलवे जैसे नया उद्घाटन हो 

और उस पर पहली बार कोई परीक्षण करे , 

परंतु परीक्षण में लाखों करोड़ों लोगों का ख्याल तो है ही  !

जब कोई गुरु , जब कोई वैज्ञानिक सत्य देखता है तो

 वो नई रेलवे लाइन का परीक्षण करने वाले की तरह होता है, लेकिन अंततः रेलवे सभी का है | 

क्या हम engineers अभियंता दल से ये कह पाएंगे 

कि ये रेलवे तुम्हारी निजी सोच है , इस मेट्रो line में मेरी सोच नहीं  है –

 मेरी सोच अलग है तो मेरी Railway line अलग होगी | 

व्यक्तिगत सत्य , मेरा नज़रिया, तेरा नज़रिया – ये सब मन का खेल है !

सत्य तो सार्वभौमिक है , उसका प्रताप अनंत है !

तो ये सवाल कीमती है कि सच नज़रिया या नियम 

प्रेम सार्वभौमिक है और तेरे हिसाब से प्रेम , मेरे हिसाब से प्रेम – ये सब प्रेम होता ही नहीं है !

प्रेम है , रहेगा और अनंत शक्तिशाली है !

सत्य है , रहेगा और अनंत सामर्थ्यवान है !

हाँ कोई व्यक्ति जो खुद को मिटा दे और अनुभवों और तजुर्बे के जाल को छोड़ दे तो,

 वस्तुतः पहली बार , पहली दफा कोई नज़रिया, कोई नजर उपलब्ध हो जाती है ! 

तब सत्य सभी के लिए समान दिखाई देता है !

सत्य नियम की तरह प्रकट होता है | 

तब मूर्खतापूर्ण ढंग से नहीं कहा जाता कि सच नज़रिया है | 

क्योंकि अस्तित्व के नियम अलग अलग कैसे हो सकते हैं अलग अलग लोगों के लिए ! 

नहीं – सत्य नियम की खोज है और वो सभी के लिए समान है !

सच नज़रिया या नियम : सच है नियम , जिसके हिसाब से चलने में ही भलाई है | 

अपना-अपना और तेरे हिसाब से सच , मेरे हिसाब से सच !

 ऐसी बकवास बेहोशी , अहंकार और अप्रेम की अवस्था से आती है 

और उसे तुरंत स्वाहा कर दिया जाना चाहिए किसी भी ऐसे  व्यक्ति को ,जो आध्यात्मिक यात्रा में उत्सुक है !

अब आप समझे हों शायद कि सच नज़रिया या नियम है !

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